चांद

मैं चांद कहा करता था उसे बीते दिनों में आज मोहब्बत पर भारी मजबूरियां हैं,

चंद लम्हें ही तो बीते हैं उसके बिन यूं लगता है जैसे गुज़री कई पीढ़ियां हैं;

मंज़िल पे जाने को चढ़े थे सिढ़ियों पे हम मगर साथ उसके यूं लगा था , मंज़िल ही जैसे सिढ़ियां हैं;

तमाम शहर में तन्हा मैं हि तो नहीं अकेला फिर क्यों मुझे हि डसती ये तन्हाईयां हैं;

दोष देते हैं उसे फिर याद आता है हमें चांद है वो इसलिए तो दरम्यान ये दूरियां हैं;